भाइयो मई पिछले दो सालो से पत्रकारिता के गुर सिखने का प्रयास कर रह हूँ पर आज तक मेरा मन नही कहता की मई कभी पत्रकार बन पाउँगा . कालेज पुरा कर के मै जब पत्रकारिता के सपने अपने मन में संजोए पत्रकारिता के बड़े बड़े महन्न्तो के पास जाकर अपने मन की बाते बताई और कहा की मै अपने कलम की ताकत से इस समाज को बदल डालूँगा सब लोगो ने मेरे हौसले की तारीफ की और कहा की इस छेत्र में आपका गुरु कौन है मैंने भी काफी बड़े बड़े गुरुओ का नाम बताया जो मेरे लिए पत्रकारिता के आदर्श थे तो पहले तो लोग मुस्कराते थे और फिर कहते की कोई तुम्हारा रिश्तेदार है की नही इस क्षेत्र में मै कहता नही तो लोग मंद मंद मुस्कुराते और कहते की ठीक है अपना नाम और फोन नम्बर बाहर लिखवा दो जल्दी ही हम तुम्हे बुला लेंगे पर मै नही जनता था की लोगो की मुस्कराहट का मतलब क्या था मै महीनो इंतजार करता और सोचता की सायद कभी न कभी तो लोग मुझे बुलाएँगे . धीरे धीरे साल बीत गया और तब मुझे उन लोगो की मुस्कराहट का अभिप्राय समझ में आया .मेरा धैर्य आब धीरे धीरे टूट रहा था फिर मेरा एक दोस्त जिसे मौका मिल गया था उसने कहा की यार जब तक तुम कोई द्रोणाचार्य नही मिलता तुम रणभूमि में नही उतर पाओगे, मैंने भी उसकी बात मन ली और उसी ने मुझे एक द्रोणाचार्य से मिलवाया पर ये द्रोणाचार्य तो रोज ही मुझसे गुरूद्क्षिना मागने लगे मै भी दक्षिणा दे दे कर प्रयाश करना सुरु किया धीरे धीरे मै अपनी लेखनी के मध्यम से काफी लोगो तक पंहुचा लोकप्रिय भी हुआ पर एक दिन हमारे यहाँ के एक लोकप्रिय नेता जो लोगो के बिच काफी चर्चित है जिन्हें दंगा कराने का पैदाशी हक है उनसे साम्प्रदायिकता की परिभाषा पूछ बैठा परिणाम स्वरूप मुझे दुसरे ही दिन अख़बार के दफ्टर से बाहर का रास्ता दिखा दिया पर मैंने भी कसम खा राखी थी की चाहे कुछ भी हो जाए मै मै पत्रकार जरुर बनूँगा फिर मै मोटी गुरुदक्षिणा देकर फिर पहुँचा पर मेरी वाद विवाद करने की आदत नही गई फिर मुझे एक दिन एक बहुत बड़े उद्योग पति के कारखाने पर हो रहे जागरण में भेजा गया पर वहा उस कारखाने से होने वाले शोर और धुए से आस पास के गावो में रहने वाले लोगो को काफी परेसानिया हो रही थी मैंने उसके बारे में एक ख़बर लिख दी पर उसका पुरस्कार मुझे दुसरे दिन ही मिल गया दरअसल वो महोदय काफी विज्ञापन देते थे अख़बार को इसलिए मुझे दुसरे दिन ही अख़बार से बाहर कर दिया गया फिर मैंने सोचा की चलो प्रिंट नही तो इलेक्ट्रॉनिक मिडिया में कोसिस करता हूँ और अपने छोटे से सहर को छोड़कर लखनऊ आ गया.पर यह भी वही हाल था आज भी मै अपने गुरु द्रोणाचार्य की तलाश में भटक रहा हूँ की कब इस एकलव्य को अपने गुरु द्रोणाचार्य मिलेंगे
तलाश जारी है ..................................
Tuesday, October 21, 2008
Sunday, July 6, 2008
पाल बाँधना छोड़ दिया हैजब से मैंने नाव में,मची हुई है अफरा-तफरी,मछुआरों के गाँव में।।
आवारागर्दी में बादलमौसम भीलफ्फाज हुआ,सतरंगी खामोशी ओढ़ेसूरजइश्क मिजाज हुआ,आग उगलती नालें ठहरीं,अक्षयवट की छाँव में।।
लुका-छिपी केखेल-खेल मेंटूटे अपने कई घरौदें,औने-पौनेमोल भाव मेंचादर के सौदे पर सौदे,लक्ष्यवेध का बाजारू मन,घुटता रहा पड़ाव में।।
तेजाबी संदेशों में गुमहैं तकदीरे फूलों की,हवा हमारे घर को तोड़ेसाँकल नहीं उसूलों की,शहतूतों पर पलने वाले,बिगड़ रहे अलगाव में।।
आवारागर्दी में बादलमौसम भीलफ्फाज हुआ,सतरंगी खामोशी ओढ़ेसूरजइश्क मिजाज हुआ,आग उगलती नालें ठहरीं,अक्षयवट की छाँव में।।
लुका-छिपी केखेल-खेल मेंटूटे अपने कई घरौदें,औने-पौनेमोल भाव मेंचादर के सौदे पर सौदे,लक्ष्यवेध का बाजारू मन,घुटता रहा पड़ाव में।।
तेजाबी संदेशों में गुमहैं तकदीरे फूलों की,हवा हमारे घर को तोड़ेसाँकल नहीं उसूलों की,शहतूतों पर पलने वाले,बिगड़ रहे अलगाव में।।
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