Sunday, July 6, 2008

पाल बाँधना छोड़ दिया हैजब से मैंने नाव में,मची हुई है अफरा-तफरी,मछुआरों के गाँव में।।
आवारागर्दी में बादलमौसम भीलफ्फाज हुआ,सतरंगी खामोशी ओढ़ेसूरजइश्क मिजाज हुआ,आग उगलती नालें ठहरीं,अक्षयवट की छाँव में।।
लुका-छिपी केखेल-खेल मेंटूटे अपने कई घरौदें,औने-पौनेमोल भाव मेंचादर के सौदे पर सौदे,लक्ष्यवेध का बाजारू मन,घुटता रहा पड़ाव में।।
तेजाबी संदेशों में गुमहैं तकदीरे फूलों की,हवा हमारे घर को तोड़ेसाँकल नहीं उसूलों की,शहतूतों पर पलने वाले,बिगड़ रहे अलगाव में।।

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